हिन्दी दिवस विशेष: कोई हिन्दी का अध्यापक क्यूँ नहीं बनना चाहता? "हिंदी का मोल" (लघुकथा)

कोई नहीं चाहता कि उनका बच्चा हिंदी के अध्यापक जैसा बनें ?
 
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सरकारी कर्मचारी के वेतन पर सिर्फ CBI, ED और समाज की ही नजर नहीं होती


डिजिटल डेस्क : हिन्दी के अध्यापक प्राय: दो व्यवहार के होते हैं, एक जो बहुत धीर गंभीर होते हैं और जिनकी जड़े बहुत गहरी होती हैं। दूसरे जो छिछले स्वाभाव के और बड़बोले होते हैं। इन दोनो में एक बड़ा अंतर है, पहले के लिए इज्जत दिल से निकलती हैं और दूसरे को मुँह मात्र पर इज्जत मिलता हैं पर इन दोनो में एक ही समानताएं हैं कोई नहीं चाहता कि उनका बच्चा हिंदी के अध्यापक जैसा बनें।

हिंदी के एक अध्यापक हैं राधामोहन व्यास जी कड़क स्वभाव, ज्ञानी, नियम के पक्के यानी हिंदी के इस अध्यापक को अंग्रेजी में कहा जाए तो No Nonsense Man मजबूरी में अध्यापक बनें पर हिंदी में रूची बेहद था, दरसल Doctorate करना चाहते थें प्रोफेसर बनना चाहते थें पर जब विवाह हो जाए और बेरोजगार हों तो समाज आपको जर्सी का बछवा समझने लगता हैं तो जर्सी का बछवा बनने से बेहतर उन्होंने कम ओहदे पर ही समझौता कर लिया।

एक NRI दंपत्ती जब वापस भारत आए तो उन्होंने अपने बच्चों को पढाने के लिए व्यास जी से अनुरोध कि विनयवश या पत्नी के दबाव में उन्होनें पढ़ाना मंजूर कर लिया पर नि:शुल्क!
उनका एक पुत्र है श्लोक उसे हूबहू अपने ही साँचे में ढाल रखा था मस्साब ने उत्तम संस्कार और ओजपूर्ण श्लोक विद्या मंदिर में पढ़ता था पर 'मास्साब' संतुष्ट नहीं थे।

दरसल व्यास जी ने समाज का एक चेहरा देखा था संस्कारी और संयमी व्यक्ति को ये समाज अपनाता नहीं कोई नहीं चाहता ऐसे व्यक्तियों के साथ समान्य व्यवहार करना, इनकी इज्जत इन्हें अलगाव भेंट करती हैं। समाज के किसी भी हिस्से के साथ ये हँसी-मजाक नहीं कर सकते, ये जीवन के किसी मोड़ पर हो इन्हें हमेशा समझदार, सख्त और चिंतनशील दिखना ही पड़ता हैं। व्यास जी ने तो समाज का खुद के प्रति ये व्यवहार स्वीकार कर लिया पर उन्हें बदलते दौर में अपने लड़के की चिंता सताने लगी। इसी चिंता में और आने वाले अवसाद से बचाने के लिए उन्होंने श्लोक का दाखिला विद्या मंदिर से रद्द करा सेंट हेलेना स्कूल में करा दिया।

जीवन सामान्य ही चल रहा था पर सरकारी कर्मचारी के वेतन पर सिर्फ CBI, ED और समाज की ही नजर नहीं होती बल्कि वक्त भी सरकारी कर्मचारी के वेतन पर आँख लगाए रहता है। हुआ यूँ कि व्यास जी का लिखा एक लेख अखबार में छपा जिसमें उन्होंने शिक्षा विभाग कि लिपा-पोती का संकेत दिया था। ये बात विभागीय आलाधिकारीयो को रास नहीं आयी और व्यास जी पर जाँच बिठाते हुए वेतन रोकने का आदश पारित किया गया। पर साच को आँच क्या? व्यास जी ने मामले को हल्के में ही लिया।

धीरे-धीरे 6 माह बीत गये और घर की जमापूँजी खत्म होने लगी इस बात से व्यास जी के माथे पर शिकन तो दिखी पर उन्हें सख्त ही रहना था। 6 से 9 महीने हो गए और व्यास जी ने न्यायालय का सहारा लिया। इधर परिवार कि हालत भी बिगड़ती गयी श्लोक कि फीस 6 महीने से नहीं भरी गयी थी और बनिए का उधार व्यास जी को सर उठाकर चलने से रोकता था।

इस मुसीबत में पत्नी ने सुझाया NRI दंपत्ती काफी पैसे वाले हैं और आपने उन्हें नि:शुल्क सेवा दी हैं क्यों न उनसे सहायता ली जाय? व्यास जी ने साफ इनकार कर दिया पर पत्नी ने बहुत समझाया श्लोक के पढाई की दुहाई दी गयी बताया कि विद्यालय से नाम काटने की धमकी आ रही और घर में भोजन तक कि समस्या हो रही आप न जाएं तो उनके मिसेज से मैं ले सकती हूँ। ना नुकुर कर के व्यास जी भी मान गए और उनकी पत्नी जा पहुँची।

श्रीमती व्यास और श्रीमती मेहरोत्रा कि ये भेंट सौभाग्य से फलदायी रही और श्रीमती मेहरोत्रा ने 15000 ₹ श्रीमती व्यास को दिया और कहा ये हमारी ओर से सर जी को भेंट हैं लौटाने की आवश्यकता नहीं बस गुरू दक्षिणा समझ कर रख लीजियेगा। इस वक्त ये पंद्रह हजार व्यास जी के परिवार के लिए दस महीने के वेतन से बढ़ कर था। पति को पंद्रह हजार देते हुए श्रीमती व्यास जी बोली जाकर मुन्ना कि फीस भर दीजिएगा और राशन का भी प्रबंध करिएगा।

पैसे लेकर व्यास जी सेंट हेलेना पहुँचे और श्लोक की फीस भरने को कहा क्लर्क ने कम्प्यूटर खोल कर देखा और कहा 6 महीने का बकाया?
फिर पूछा क्या करते हैं भाई साहब?
व्यास जी मुँह थोडा फेरते हुए धीरे से बोले अध्यापक हूँ हिंदी का।
क्लर्क ने कम्प्यूटर पर निगाह जमाएं हुए कहा- बारह हजार छ: सौ।
व्यास जी- पर पंद्रह सौ रूपए महीने के हिसाब से तो मात्र नौ हजार ही हुए?
क्लर्क- जी नौ हजार फिस छह सौ रूपए लेट फिस और तीन हजार हिंदी के
व्यास जी- मतलब?
क्लर्क- आपका बच्चा छह महीने में कुल 60 बार हिंदी बोलते पकड़ा गया हैं 50 रूपए एक बार के जुर्माने का....