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Amitabh Bachchan और उनके परिवार के लिए विंध्याचल में हो रहा विशेष अनुष्ठान

AMITABH BACHCHAN और उनके परिवार के लिए विंध्याचल में हो रहा विशेष अनुष्ठान।मिर्ज़ापुर में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और उनके पूरे परिवार के सदस्यों अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन समेत उनकी बेटी आराध्या बच्चन के कोरोना पॉजिटिव आने की खबर के साथ ही विंध्याचल धाम में विशेष पूजा-अर्चना की जा रही हैं ।आपको बता दें माँ विंध्यवासिनी के अनन्य भक्त अमिताभ बच्चन की माता रानी में विशेष आस्था हैं । इसीलिए उन्होंने बेटे अभिषेक के विवाह के पूर्व उन्होंने अभिषेक और ऐश्वर्या के साथ दर्शन पूजन किया था । यही पर सिंदूर दान भी होने की बात पंडा समाज ने हमसे बातचीत के दौरान बताई है। पूरे बच्चन परिवार के स्वास्थ्य की कुशलता के लिए विशेष पूजा अर्चना श्रीविंध्य पंडा समाज के द्वारा किया जा रहा हैं ।कल रात अमिताभ बच्चन ने अपने और अभिषेक के कोरोना पॉजिटिव आने की ख़बर ट्वीट करके सभी को दी थी। जिससे देश समेत जनपद मिर्ज़ापुर में काफ़ी हड़कंप मच गया था। लोग ईश्वर से पूरे बच्चन परिवार के स्वास्थ्य होने की मंगलकामना करने लगे हैं।आज सुबह बहु ऐश्वर्या राय बच्चन और पोती आराध्या बच्चन की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आयी है। ऐसे में पूरे देश में बढ़ते कोरोना मामलों पर चर्चा तेज़ हो गयी है।बॉलीवुड से एक और परिवार हुआ है कोरोना संक्रमित।अनुपम खेर की माता दुलारी देवी समेत उनकी भतीजी की कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आई है । अनुपम खेर अन्य सदस्यों की रिपोर्ट आने का इंतज़ार किया जा रहा है।

बिना पैरों के ही लेकर दौड़ रहे हैं ज्ञान की मशाल : गोपाल खंडेलवाल

बिना पैरों के ही लेकर दौड़ रहे हैं ज्ञान की मशाल : गोपाल खंडेलवाल।आज हम आपका परिचय एक बहुत ही प्रेरणादायी व्यक्ति से करवाने वाले हैं। जिन्होंने ये साबित कर दिया कि “कुछ भी हो सकता है”। इसी नामुमकिन को मुमकिन करने वाले ज़ज़्बे के बारे में हम जानेगें कि कैसे बिना पैरों के ही सफलताओं के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचें या यूँ कहें लोगों को पहुँचाया।मिर्ज़ापुर जिला मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कछवां ब्लॉक के पत्तिकापुर गाँव में साल 1999 से रह रहे गोपाल खंडेलवाल, पढ़ाई से डॉक्टर और पेशे से अध्यापक हैं।साल 1996 में सी.पी.एम.टी की परीक्षा में अव्वल हो कर, एक गाड़ी से वापस लौट रहे थे तभी इनकी खुशियों पर काले बादल छा गए और एक्सीडेंट हो गया, इस दुर्घटना में इन्हें चोटें भी आईं। शुरुआत में लग रहे मामूली फ्रैक्चर जो आगे चल कर बड़ी समस्या के रूप में सामने आया। इनके कमर के नीचे के हिस्से को लकवाग्रस्त हो गया था। इसमें अपने दोनों पैरों को गंवा बैठे हमेशा के लिए और इसी साथ गोपाल के जीवन में सब कुछ बदल गया।गोपाल खंडेलवाल अपने दोनों पैरों के सहारे भले ही 2 कदम भी नहीं चल पाते हों, लेकिन अब तक हज़ारों बच्चों की बगीचे में निशुल्क पढ़ा कर उन्हें ज़रूर हज़ारों कदम आगे पहुँचा दिया है। 20 सालों से लगातर कई मौके पर गाँव वालों का इलाज भी करते हैं। सुबह 5 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक इनका वक़्त बच्चों की साथ ही गुज़रता है। चारपाई से उठाकर व्हीलचेयर पर बैठा दिया जाता है और पूरे दिन बगीचे में बच्चों को पढ़ाने में गुज़ार देते हैं।हज़ारों बच्चों की ज़िन्दगी में रौशनी बिखरने के बावजूद भी आज इनके जीवन में अंधकार है। लाचारी और बेबसी ने इन्हें भीतर से तोड़ कर रख दिया है। अक्सर पीठ में दर्द उठता है जिसके लिए इन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। जिसमें काफ़ी खर्च भी आता है।गोपाल ने सोचा कि ऑनलाइन ट्विटर के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को अपनी स्तिथि की जानकारी पहुँचाई जाए। लेकिन अथक प्रयासों के बावजूद किसी से कोई मदद नहीं मिली है।इसी क्रम में बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबेरॉय भी सामने आए और उन्होंने “द रियल हीरो” के नाम की एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई थी। 2018 में जिसका टीवी पर भी प्रसारण हुआ था। इस मदद में उन्हें सिर्फ़ एक व्हीलचेयर प्राप्त हुई थी, उसके आगे उन्हें कभी किसी से कुछ नहीं मिला।आपको बता दें इन दिनों गोपाल खंडेलवाल को पैसों की बहुत जरूरत है जिससे ये अपना इलाज़ और ऑपरेशन करवा पायें।यूँ तो इस घटना को एक अरसे का वक़्त हो चुका है। लेकिन यह ज़ख्म और कुरेद जाता है जब सरकार या कोई बड़ा आदमी मदद को आगे नहीं आता है।हम चाहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक यह ख़बर पहुँचे जिससे गुरुकुल वाले गोपाल सर की मदद हो सके।

Sanitizer Dispenser : किसान के बेटे का अनोखा जुगाड़, बिना हाथ लगाए होगा सैनिटाइज

किसान के बेटे का अनोखा जुगाड़, बिना हाथ लगाए होगा सैनिटाइजकोरोना वैश्विक महामारी नियंत्रण के लिए एक ऐसी जुगाड़ मशीन बनाई जो बिना हाथों से स्पर्श किये आपके हाथों को सैनिटाइज कर देती है। इसे बनाने में महज़ पांच सौ रुपये का लागत आयी है।जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। इंसान को जब किसी चीज की ज़रूरत होती है तो इंसान उसके जुगाड़ में लग जाता है। कुछ ऐसा ही अनोखा जुगाड़ जमालपुर क्षेत्र के भदावल गांव रहने वाले किसान के पुत्र ने कर दिखाया है।तुषार पटेल ने इस जुगाड़ मशीन को पैरों द्वारा चलित हैंड फ्री सैनिटाइजर मशीन नाम दिया है। इस मशीन की खासियत है कि बिना हाथ का लगाए सिर्फ़ पैर से ही मशीन के लगे पैड को दबाने पर सैनिटाइजर बाहर आ जाता है। इसे आप बाहर से घर के भीतर आने से पहले इसका प्रयोग कर संक्रमण के घर में जाने का खतरे की रोकथाम की जा सकती है। आपको बता दें इस तरह के उपकरण को विद्यालय, सिनेमा हाल, दुकानों, कार्यालयों सहित अन्य पब्लिक प्लेस पर लगाकर कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है।इंटरनेशनल हिदू स्कूल नगवां जनपद वाराणसी में साइंस ग्रुप से कक्षा 09 में पढ़ने वाले तुषार पटेल ने बताया कि उपकरण तैयार करने में लगने वाले सामानों को इकट्ठा कर 22 जून 2020 से ही इसे बनाना शुरू किया था और एक हफ़्ते में इसे तैयार कर दिया। इस जुगाड़ मशीन को बनाने के बाद इसका एक ट्रायल करने के लिए इस घर से बाहर लगा दिया और बाहर से घर आने या बाहरी लोगों के घर आने पर सैनिटाइज करके ही घर में प्रवेश दिया जाता है।गौरतलब है कि महज़ 500 रुपये की लागत से बनी इस मशीन बहुत ही कारगर साबित हो रही है। बाल वैज्ञानिक तुषार ने बताया कि ये जुगाड़ मशीन तैयार करने में अभिवावकों और गुरुजनों ने पूरा सहयोग दिया है तथा आगे चलकर वैज्ञानिक बनकर देश की सेवा करने की इच्छा जताई है। पिता सुदेश सिंह व माता मुन्नी देवी का कहना है कि बचपन से ही क्रिएटिव माइंड रहा है तुषार का इसी बात ध्यान में रखते हुए उन्होंने इसकी मंजूरी दे डाली और पूरा सहयोग भी किया। अभिवावकों समेत आप-पास के लोग भी काफ़ी खुश है ।

Gi Tag : रामनगर चोखा के लिए विख्यात बैंगन साथ मिर्ज़ापुर के आदम चीनी चावल को भी भेजा गया

रामनगर चोखा के लिए विख्यात बैंगन साथ मिर्ज़ापुर के आदम चीनी चावल को भी भेजा गया।मिर्ज़ापुर के चार प्रोडक्ट्स सहित उत्तर प्रदेश के 26 उत्पाद जीआई रजिस्ट्रेशन ( GI Tag ) के लिए चिह्नित किए गए हैं। वर्ल्ड फेमस बनारसी पान व लंगड़ा आम को भी GI Tag मिल सकता है। साथ ही साथ रामनगर के चोखा के लिए विख्यात बैंगन और आदम चीनी चावल को भी Gi Tag की सूची में शामिल किया जाएगा। आइये जानते हैं Gi Tag के बारे में विस्तार सेआख़िर ये जीआई टैग क्या होता है?दअरसल GI टैग्स इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) का हिस्सा हैं जो पेटेंट्स से मिलते-जुलता है। GI टैग किसी भौगोलिक परिस्थिति के आधार पर दिए जाते हैं और पेटेंट नई खोज तथा आविष्कारों को बचाए रखने का माध्यम हैं। गौरतलब है कि भारतीय संसद ने 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स’ लागू किया था, इस हिसाब से भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली स्पेशल चीज़ का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है।बनारसी साड़ी, बंगाली रसगुल्ला,मैसूर सिल्क, कोल्हापुरी चप्पल, दार्जिलिंग चाय इसी कानून के अन्तर्गत संरक्षित है। इस चित्र में रसगुल्ले का GI टैग सर्टिफिकेट देख सकते हैं।जैसा कि नाम से ही साफ है, जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग्स का काम उस खास भौगोलिक परिस्थिति में पाई जाने वाली चीज़ों के दूसरे जगहों पर गैर-कानूनी इस्तेमाल को रोकना है।किसको मिलता है ये ख़ास टैग।किसी भी चीज़ को GI टैग देने से पहले उसकी क़्वालिटी और प्रोडक्शन की अच्छे से जांच की जाती है। ये तय किया जाता है कि उस खास चीज़ की सबसे ज़्यादा और ओरिगिनल पैदावार निर्धारित राज्य की ही है। इसके साथ ही यह भी तय किए जाना बहुत जरूरी होता है कि भौगोलिक स्थिति का उस चीज़ की पैदावार में कितना योगदान है। कई बार किसी खास चीज़ की पैदावार एक विशेष स्थान पर ही संभव होती है। इसके लिए वहां की जलवायु से लेकर उसे आखिरी स्वरूप देने वाले कारीगरों तक का हाथ होता है। उदाहरण के तौर पर हल्दीराम भुजिया सिर्फ़ नागपुर में ही बनाई जा सकती है, क्योंकि नागपुर के पानी और हवा का बहुत बड़ा योगदान है इसके निर्माण को पूरा करने में।GI टैग्स मिलने से क्या फ़ायदा होता है :GI टैग मिलने के बाद इंटरनेशनल मार्केट में उस चीज़ की कीमत और उसका वैल्यू बढ़ जाती है। इस कारण से इसका एक्सपोर्ट बढ़ जाता है और साथ ही देश-विदेश से लोग एक खास जगह पर उस स्पेशल सामान को खरीदने आते हैं। इस कारण इस क्षेत्र का टूरिज्म भी बढ़ता है। किसी भी राज्य में ये स्पेशल चीज़े उगाने या बनाने वाले किसान और कारीगर गरीबी की रेखा के नीचे आते हैं। GI टैग मिल जाने से बढ़ी हुई एक्सपोर्ट और टूरिज्म की संभावनाएं इन किसानों और कारीगरों को आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करती हैं।मिर्ज़ापुर में क्या होने जा रहा है ?इस संबंध में पद्मश्री व Gi Tag विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत ने तैयारी शुरू कर दी है। मिर्ज़ापुर के आदम चीनी चावल को विशेष रूप से फोकस किया गया है। यह चावल जिले के भुइली, चकिया व शेरवां के गांव की ओर बहुतायत में पैदा होता है। यह अपने स्वाद व खुशबू के लिए मशहूर है।एक रोचक तथ्य ये भी है कि रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के गांव में इस चावल की बहुतायत से पैदावार होती है। इन उत्पादों को Gi टैग मिलने के बाद मिर्ज़ापुर को भी वर्ल्ड पॉपुलैरिटी मिलेगी। इसी प्रकार से बनारसी पान परंपरागत रूप से लोगों को पसंद आता है। सब्जियों में बैंगन व फलों में लंगड़ा आम भी प्रसिद्ध है। बनारसी लंगड़ा आम के मुकाबले का कोई आम नहीं है। इसीलिए इसे भी जीआई टैग मिलने वाला है।पद्मश्री व Gi Tag विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत ने बताया कि उत्तर प्रदेश के एक जनपद एक उत्पाद में चयनित बाराबंकी का हैंडलूम, मुज्जफरनगर का गुड़, आगरा का लेदर फुटवियर, बागपत का हैंडलूम उत्पाद, जालौन का हैंडमेड पेपर के जीआई पंजीकरण प्रक्रिया को वहां की स्थानीय उत्पादक संस्थाओं द्वारा नाबार्ड एवं प्रदेश सरकार (ओडीओपी सेल-एमयसएमई विभाग) के सहयोग से संस्था ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा शुरू किया जा चुका है।

युवाओं के लिए मिसाल आस्था पटेल, चुनौतियों को मात देकर बनी डॉक्टर

युवाओं के लिए मिसाल आस्था पटेल, चुनौतियों को मात देकर बनी डॉक्टर।मिर्ज़ापुर क्षेत्र के नदिहार की निवासी इन्द्रकेश सिंह की बेटी आस्था पटेल ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी MBBS की परीक्षा में बेहतर स्थान प्राप्त कर पूरे जिले को गौरवांवित किया है। डा. आस्था पटेल के सम्मान में परिजन व प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने वाले गुरुओं ने मुंह मीठा करा कर सम्मानित किया गया। भूमि पुत्र की बिटिया आस्था पटेल MBBS की फाइनल पढ़ाई में बेहतर स्थान लाकर पूरे जिले का नाम रोशन किया है।आपको बता दें आस्था रानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज झांसी में एमएस की छात्रा है। डा. आस्था पटेल ने कहा कि किसान पिता इंद्रकेश सिंह व माता रवि बेन पटेल के सहयोग से लक्ष्य के प्रति कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। MBBS की फाइनल परीक्षा में बेहतर स्थान मिला।आइये जानते हैं सफलता की पुरी कहानी आस्था की ज़ुबानी।डा. आस्था पटेल ने बताया कि मेरी पढ़ाई राधेश्याम शिक्षण संस्थान धनसिरिया राजगढ़ से शुरू हुई। आगे की पढ़ाई कक्षा 06 से कक्षा 08 तक नवोदय विद्यालय पटेहरा में हुई। डीएवी पब्लिक स्कूल DAV Public School सोनभद्र में हाईस्कूल की पढ़ाई की। इंटर के लिए कृषि विज्ञान केंद्र नगवा बनारस में दाखिला लिया। इसके बाद बनारस में ही रहकर एक साल तक MBBS की कोचिग की। 2013 में पहले ही कोशिश में मेडिकल का एंट्रेंस एग्जाम क्लियर किया। जहाँ मुझे महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कालेज झांसी से 2013-2019 तक मेडिकल की पढ़ाई पूरी की। फिर जनवरी वर्ष 2020 में दिल्ली में नीट पीजी एंट्रेंस एग्जाम पास हुई जिसमें आल इंडिया रैंक 6075 और स्टेट लेवल रैंक 225 में मुझे एमएस स्त्री एवं प्रसूति विभाग में नामांकन मिला। अपनी कामयाबी का श्रेय आस्था अपने माता-पिता को देती हैं।पिता ने बताया कि ये सफ़र नहीं था असां।डा. आस्था के पिता इंद्रकेश सिंह और इनके भाई ब्रह्म के सिंह ने बताया कि पिता मोहन सिंह की मृत्यु के बाद खेती किसानी में लग गए। 05 बच्चों को पढ़ाना उन्हें सारी फैसिलिटी देना बहुत मुश्किल था। किसानी से कुछ नहीं मिला तो 2010 में 04 लाख का शैक्षणिक ऋण यानी एजुकेशन लोन लिया व बच्चों की पढ़ाई रुकने नही दी। गुज़रते वक़्त के साथ ज़रूरत पड़ने पर 06 लाख का किसान क्रेडिट कार्ड बनवाया और भाई के बच्चों को भी पढ़ाने लगा। मेरी बेटी डाक्टर बनी व बेटा चेतन सिंह बीटेक करने के बाद रेलवे विभाग में इंजीनियर हो गया है। छोटे भाई ब्रह्मकेश सिंह की बेटी ऋतु सिंह बीटेक B.Tech कर चुकी है। पुत्र राहुल सिंह बीटेक, एमटेक और पीएचडी phd कर रहा है। इंद्रकेश सिंह ने बताया कि सभी बच्चों को सफल देखकर अच्छा महसूस होता है। इससे ज़्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है जब आपका बलिदान सार्थक हो जाये।डाक्टर आस्था पटेल अब क्या करना चाहती हैं।डा. आस्था पटेल ने बताया कि अभी भी गाँवों में अच्छे स्कूल व कालेज नहीं हैं। जिससे यहां के बच्चे मज़बूरन बाहर जाकर पढ़ाई कर रहे हैं। यहाँ पर शिक्षा की व्यवस्था बहुत लचर है और सबसे बड़ा अंधविश्वास बना हुआ है कि जिससे लोग लड़कियों की पढ़ाई को आगे नहीं बढ़ने देते हैं। लेकिन हमारे माता पिता ने इस रूढ़िवादी बातों पर ध्यान नहीं दिया और पढ़ाई के लिए पूरा सहयोग जारी रखा। आस्था ने बताया कि मेरा भी एक सपना है कि एक अच्छा स्कूल खोल कर गाँव के बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दूं। ताकि वे जीवन में कामयाब बन सकें। बहुत से प्रतिभाशाली छात्र अच्छा सपोर्ट न मिलने से अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं।

मिर्ज़ापुर की बेटी प्राची मिश्रा हैं मिस इंडिया, हनी सिंह और मुन्ना भईया के साथ किया काम – जानिए पूरी कहानी

मिर्ज़ापुर की बेटी प्राची मिश्रा हैं मिस इंडिया, हनी सिंह और मुन्ना भईया के साथ किया काम - जानिए पूरी कहानी।आपने मशहूर फिल्म “दंगल” का वो डायलॉग तो ज़रूर सुना होगा जिसमें अमीर खान हरियाणवीं में कहते हैं “म्हारी छोरियां छोरो से कम हे के” जिसका हिन्दी में मतलब है कि “मेरी बेटियां, बेटों से कम हैं क्या?”। इसी बात को असल जिंदगी में सच कर दिखाया है मिर्ज़ापुर जिले की बेटी प्राची मिश्रा ने Miss India 2012 का ख़िताब अपने नाम करके । आइये जानते हैं पूरी कहानी।प्राची मिश्रा का मिर्ज़ापुर से सम्बंध।मिर्ज़ापुर जनपद के तत्कालीन अपर जिला जज आर सी मिश्रा और प्रभा मिश्रा के आँगन में उनकी सबसे छोटी सन्तान ने 1988 में जन्म लिया । जिसका नाम उन्होंने संस्कृत भाषा के एक प्रभावशाली शब्द “प्राची” के आधार पर रखा, इसका मतलब “पूरब”,”पहले”,”सूर्य का उदय” होना है।प्राची बचपन से ही बहुत ज़्यादा चुलबुली और नटखट स्वभाव की रहीं हैं घर में सबसे छोटे बच्चे होने का खूब जमकर लाभ उठाया है, जो कि स्वाभाविक भी है। उनके बड़े भाई राहुल मिश्रा से उनकी खूब पटती है।मिर्ज़ापुर में हुई पढ़ाई-लिखाई। वैसे तो प्राची के माता-पिता मूल निवासी इलाहाबाद (प्रयागराज) के हैं लेकिन सरकारी नौकरी के कारण काफ़ी तबादले होते रहे हैं। इसी कारण से प्राची की मिर्ज़ापुर में सिर्फ़ 12वीं तक की ही शिक्षा दीक्षा सम्भव हो पाई।प्राची मिश्रा की कक्षा 11 व 12 की शिक्षा वर्ष 2003 व 2004 में मिर्ज़ापुर के लायंस स्कूल में ही हुई है जिसमें कक्षा 10 में 68 और इंटर यानी 12 में 69 प्रतिशत अंक प्राप्त किया था।मथुरा से टेक्नोलॉजी ऑफ साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा इन बैंकिंग सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ पुणे महाराष्ट्र से की है।कैसे बनी मिस इंडिया। उत्तर प्रदेश की मिट्टी में जन्मी कई बेटियों ने अपना नाम विश्वपटल पर स्वर्ण अक्षरों से अंकित किया है। जिनमें मिस यूनिवर्स लारा दत्ता, गाज़ियाबाद से और मिस वर्ल्ड प्रियंका चोपड़ा बरेली से और अब बारी थी मिर्ज़ापुर की प्राची मिश्रा की, जो प्रियंका चोपड़ा को अपना आदर्श मानती हैं।इंजीनियरिंग और एम बी ए करने के बाद वह एक प्रतिष्ठित व अंतरराष्ट्रीय बैंक में नौकरी कर रहीं थी। जब उन्हें ब्यूटी कॉन्टेस्ट के बारे में पता चला तो ऑफिस में अपने बॉस से पीलिया होने का बहाना बना छुट्टी ली और मुंबई के लिए रवाना हो गईं।साल 2011 में उन्होंने पुणे में आयोजित हुए रेडियो मिर्ची के ब्यूटी कॉन्टेस्ट की विजेता बनी फिर 31 मार्च 2012 में फिलीपींस के मनिला में आयोजित हुए फेमिना मिस इंडिया ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया। इस कॉन्टेस्ट में उन्होंने अपने नाम मिस इंडिया अर्थ का ताज अपने नाम किया और फिर 24 नंबर 2012 में “मिस कांजेनिअलिटी” चुना गया।बॉलीवुड में एंट्री: मुन्ना भईया औऱ यो यो हनी सिंह के साथ।साल 2015 में “दिल्ली वाली जालिम गर्लफ्रैंड” फ़िल्म से बॉलीवुड में कदम रखा, जिसमें प्राची मिश्रा के साथ मिर्ज़ापुर वेब सीरीज़ के “मुन्ना भईया” दिव्येन्दु शर्मा, जैकी श्रॉफ नज़र आये।इस फ़िल्म में एक जबरदस्त हिट गाना भी था जिसे आप सब के चहिते यो यो हनी सिंह ने गया था ये गाना यूट्यूब से लेकर हर शादी पार्टी की शान बना रहा। इस गाने में यो यो हनी सिंह की बीट पर प्राची मिश्रा भी थिरकती नज़र आती है।आप भी देखिए ये वीडियो।प्राची मिश्रा की शादी।अपने करियर की शानदार सफलता से अपने परिवार समेत पूरे देश को गर्वान्वित करने के बाद प्राची ने अब जीवन के अगले पड़ाव की ओर अग्रसर हुई और इस साल 2020 में दक्षिण भारत के फ़िल्मो के मशहूर अभिनेता “महत राघवेंद्र” के साथ परिणय सूत्र में बन्ध कर एक आदर्श पत्नी का दायित्व निभा रही है।आज-कल कहाँ है प्राची और क्या कर रहीं हैं?मिर्ज़ापुर से इलाहाबाद और इलाहाबाद से लखनऊ-मथुरा उसके बाद पुणे फिर मुंबई पहुँच चुकी प्राची अब भारत के बाहर दुबई में अपने पति के साथ वैवाहिक दाम्पत्य जीवन का यापन कर रहीं है।इसके साथ ही प्राची कई सारे बिजनेस में शामिल हैं जिससे वह एक युवा उद्यमी के तौर पर अपनी छवि बना रहीं हैं। एक मॉडलिंग एजेंसी की भी शुरुआत करी है “Shock Models” जो कि बहोत ही कम समय में काफ़ी लोकप्रिय हो गयी है।दुबई में है प्राची मिश्रा का रेस्टोरेंट।भारत के कई सारे शहरों में पली बढ़ी होने के कारण भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजनों का अच्छा अनुभव है फूड लवर प्राची को, इस खाने के प्रति प्रेम ने उन्हें भारत की मिट्टी से दूर बैठे लोगों को भारतीय भोजन का स्वाद चखाने का विचार दिया।फलस्वरूप उन्होंने एक “लिटिल मिस इंडिया रेस्टोरेंट” के नामक रेस्टोरेंट की शुरुआत करी, जो अपने अनूठे स्वाद और देसी तड़के की वजह से खूब धूम मचाये हुये है। गौरतलब है कि प्राची बाक़ी कलाओं में दक्ष होने के साथ-साथ पाक कला में भी निपुण हैं।छोटे बच्चों के लिए वर्कशॉप।प्राची मिश्रा अपनी एक सहयोगी कानपुर की रहने वाली अनुराधा अग्रवाल के साथ दुबई में “मिनिस्ट्री ऑफ स्टार्स” के नाम से एक बच्चों के लिए कला,अभिनय, नृत्य से सम्बंधित वर्कशॉप चलाती हैं ।

Rinku Singh : कैसे बना WWE चैंपियन गोपीगंज, भदोही का लाल

RINKU SINGH : कैसे बना WWE चैंपियन गोपीगंज, भदोही का लाल।इंसान अगर चाह ले तो क्या कुछ नहीं कर सकता। अभी तक इस बात हम सुनते आ रहे थे लेकिन इसे हकीकत की शक्ल दी है हमारे गोपीगंज, भदोही जिले के “रिंकू सिंह” से सच कर दिखाया है। आपको बता दें एक मशहूर रियलिटी शो ‘द मिलियन डॉलर आर्म’ को जीत कर हिंदुस्तान के नाम का डंका पूरे विश्व में बजा दिया है।एक और सोचक बात है रिंकू के बारे में ये अमेरिकन प्रोफेशनल बेसबॉल लीग में चुने गए सबसे पहले भारतीय हैं। WWE सुपरस्टार बनने की Rinku Singh Indian Professional Wrestler की कहानी हम सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत है। गोपीगंज जैसे छोटे से गांव से अमेरिका जाकर सफलता हासिल करने की बात किसी बॉलीवुड फिल्म की कहानी से कम नहीं लगती है, आइये जानते हैं क्या है इसके पीछे की कहनी।एक सामान्य वर्गीय ट्रक ड्राइवर के घर में जन्मे रिंकू सिंह का बचपन साधारण बच्चों की तरह ही बीता। लेकिन 2008 में कुछ ऐसा हुआ, जिससे रिंकू सिंह की पूरी लाइफ ही बदल गई। एक बहोत बड़े अमेरिकी स्पोर्ट्स एजेंट जेबी बर्नस्टीन ने भारत में The Million Dollar Arm नाम से एक रियलिटी शो बनाया, जिसमें देश भर के कोने-कोने से हजारों नौजवानों ने हिस्सा लिया, जिसमें आपके रिंकू सिंह भी शामिल थे। इस रियलिटी शो को कराने की ख़ास वजह एक ऐसे चेहरे की खोज करना था, जो कि बेसबॉल को स्पीड और एकदम सटीकता के साथ थ्रो कर सके परन्तु ये मामला उतना आसान नहीं था जितना आपको लग रहा है।आख़िरकार महादेव के भक्त रिंकू सिंह ने सारे प्रतियोगियों को पछाड़कर रियलिटी शो को जीत लिया। रिंकू और दिनेश पटेल (शो के उप-विजेता) को अमेरिका में जाकर बेसबॉल की ट्रेनिंग करने का मौका भी मिला और उसके कुछ समय बाद रिंकू सिंह को अमेरिकी प्रोफेशनल बेसबॉल टीम पिट्सबर्ग पाइरेट्स ने साइन कर लिया। वो अमेरिकी प्रोफेशनल बेसबॉल लीग में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने और उन्होंने करीब 8 साल तक बेसबॉल खेला। अपने आप में यह कहानी यहीं पूरी हो जाती है लेकिन ऐसा नहीं है ये तो सफलता की शुरुआत है आगे जो कुछ होता है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।लगभग आठ साल बेसबॉल खेलने बाद रिंकू सिंह ने WWE सुपरस्टार बनने की सोची और उन्होंने इसी इरादे के साथ WWE द्वारा कराए गए ट्राइआउट (ट्रायल) में हिस्सा लिया। ट्राइआउट में एक गहरी छाप छोड़ने की वजह से उन्हें WWE ने 2018 में साइन कर लिया। 30 साल के रिंकू सिंह अभी WWE परफॉर्मेंस सेंटर में ट्रेनिंग ही ले रहे थे।उन्होंने NXT के कई सारे लाइव आयोजन में हिस्सा लिया है, लेकिन अभी उनके द्वारा NXT शो पर नजर आना बाकी था। आपको बता दें WWE की डेवलपमेंटल ब्रांड का नाम NXT है। Rinku Singh एक अन्य भारतीय रेसलर सौरव गुर्जर के टैग टीम पार्टनर हैं। Rinku Singh की नजर भारत के पहले WWE टैग टीम चैंपियन बनने पर थी।अंग्रेजी में था हाथ तंग, गुरु बोले नहीं चल पाओगे।WWE परफॉर्मेंस सेंटर द्वारा शेयर की गई एक वीडियो में रिंकू सिंह ने अपने शुरुआती सफर के बारे में बात करते हुए बताया कि कैसे कोच द्वारा कही गई बात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। रिंकू ने बताया, “मेरे कोच ने मुझे कहा था- ‘रिंकू तुम्हें कामयाबी नहीं मिलेगी। तुम ना इंग्लिश बोलते हो, ना तुम बेसबॉल के बारे में कुछ जानते हो और आधी दुनिया का सफर तय कर तुम प्रोफेशल बेसबॉल प्लेयर बनने आ गए।” उन कड़े शब्दों की वजह से ही मैं आज इस मुकाम पर पहुंच पाया हूँ।”कब गए अमेरिका।महज़ 18 साल की उम्र में रिंकू सिंह भारत से अमेरिका चले गए। गौरतलब है कि छोटी सी उम्र में अमेरिका जाकर बसने के बाद भी वो अपनी सभ्यता और संस्कृति को नहीं भूले, जो कि उनके WWE कैरेक्टर में भी साफ झलकती है। 18 साल की उम्र जिंदगी का वो पड़ाव होता है जिसमें अच्छे-अच्छे अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं परन्तु ये उनमें से नही है। आज भी रिंकू सिंह और सौरव गुर्जर रिंग में एक खास गैट-अप में उतरते हैं। दोनों ही सुपरस्टार्स माथे पर तिलक, आंखों में सुरमा, गले में रुद्राक्ष की माला, धोती और गमछा पहनते हैं, असली भारतीय होने की पहचान का परचम लहराते हुए।रिंकू सिंह बड़े धार्मिक व्यक्ति हैं या यूँ कहें कि देवों के देव महादेव के तगड़े फैन हैं। उनकी इंस्टाग्राम पर शेयर की गई फोटोज़ को देखकर ये बात साफ समझी जा सकती है। उन्होंने अपनी बाजू पर राम नाम का टैटू भी बनवाया हुआ है। जो अपने आप में अद्भुत है।माँ का साया नही रहा।रिंकू सिंह के सफ़र में मुसीबतों और कठिनाइयों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था। छोटी से उम्र में काफी उतार-चढ़ाव देखने के बाद रिंकू को सबसे बड़ा झटका पिछले साल लगा, जब उनकी माता का देहांत हो गया। जब रिंकू पहली बार भारत से अमेरिका जा रहे थे, तब उनकी मां ने उन्हें ‘राम’ नाम वाला गमछा दिया था, जो आज भी रिंकू ने संभालकर रखा हुआ है। इसी कारण से उन्होंने “माँ” का टैटू भी करवा रखा है।इस बारे में बोलते हुए भावुक होकर Rinku Singh ने कहा, “जब मैं पहली बार अमेरिका आ रहा था, तब मेरी मां ने मुझे ये दिया था। मुझे गर्व है कि भारत से दूर होने के बावजूद मैंने अपनी संस्कृति को हमेशा अपने साथ रखा। ये गमछा मुझे उनके द्वारा सिखाई गई बातों के बारे में याद दिलाता है। काश! मेरी मां यहां होतीं तो उन्हें मुझ पर बहुत गर्व होता।”गोपीगंज से व्हाइट हाउस तक का सफ़र।अमेरिकी प्रोफेशनल बेसबॉल लीग में खेलने वाले रिंकू ने भदोही के एक छोटे से गांव गोपीगंज से लेकर व्हाइट हाउस तक का सफर तक किया है। वो व्हाइट हाउस में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराब ओबामा से भी मिल चुके हैं। यहां तक कि उनकी जिंदगी पर डिज़नी कम्पनी द्वारा एक फिल्म भी बनाई जा चुकी है, जिसका नाम Million Dollar Arm है।इस फिल्म में Rinku Singh के रियलिटी शो जीतने से लेकर पिट्सबर्ग पाइरेट्स द्वारा साइन किए जाने तक की कहानी है। साल 2014 में आई इस फिल्म में मशहूर एक्टर सूरज शर्मा ने रिंकू सिंह का किरदार निभाया है। इस फिल्म का म्यूजिक ए आर रहमान ने दिया है।जॉन सीना को अपना आदर्श मानते हैं रिंकू भईया, आने वाले समय में कई सारे मैच खेले जाने हैं। माटी ये लाल अपनी भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति, माँ के प्रति अपार प्रेम और अथक परिश्रम की जीती-जागती मिसाल है। मिर्ज़ापुर समेत पूरे देश को गर्व है अपने इस माटी के लाल पर।

Wasliganj : 300 साल पुराना है मिर्ज़ापुर का पहला मार्केट – जानिए पूरी कहानी

Wasliganj : 300 साल पुराना है मिर्ज़ापुर का पहला मार्केट - जानिए पूरी कहानी।Wasliganj : मिर्ज़ापुर जनपद हज़ारों सालों से अस्तित्व में है इतिहासकार मानते हैं कि 5000 BC से इंसानों के यहाँ होने के प्रमाण मिले हैं। आसान भाषा में कहें तो युगों युगों से मिर्ज़ापुर इस धरती पर मौजूद रहा है मतलब त्रेता, द्वापर सभी युगों में ।अगर हम पौराणिक मान्यताओं और लोककथाओं को एक तरह तरफ़ करके मतलब “गिरज़ापुर”, “Mirzapore” और “मीरजापुर” वाले नामों की बात छोड़ कर इसके लिखित “मिर्ज़ापुर” वाले इतिहास की बात करें तो इसकी स्थापना 1735 में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा की गई थी लेकिन इस शहर में विकास कार्य लॉर्ड मरकुरियस वेल्सले नाम वाले एक बड़े अंग्रेजी असफ़र ने किया था।कौन था ये अंग्रेजी अफ़सर।इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है। सन 1760 रिचर्ड कॉली आयरलैंड में पैदा हुआ ये अफ़सर जब इंग्लैंड में था तब इनसे कोई तीर नहीं मारा जा रहा था, लोगों ने सुझाया कि तुम्हें किसी दूसरे देश जा कर अपनी काबिलियत साबित करनी चाहिए जहाँ पर सब कुछ एक सिरे से शुरू करना हो। ऐसे में अंग्रेज़ी हुकूमत ने इन्हें 1793 में भारत बुला लिया, 37 साल की उम्र में इनकी नियुक्ति ईस्ट इंडिया कम्पनी के लॉर्ड गवर्नर जनरल के रुप में हुई । व्यापार के विस्तार के लिए इन्हें इलाहाबाद-मिर्ज़ापुर-बनारस क्षेत्र सौंपा गया। आगे चल के बंगाल का कार्यभार ग्रहण किया जो जग-जाहिर है।मिर्ज़ापुर में क्या-क्या किया ?वेल्ज़ली, वैल्सली, वेल्सले या वासली का नाम इतिहास में काफ़ी महत्वपूर्ण जगहों पर देखा जा सकता है चाहे वो “सहायक-सन्धि” को व्यापक रूप से पूरे देश में लागू करने की बात हो या फिर “टीपू सुल्तान” साथ समझौते की वार्ता का ज़िक्र हो जिसका विरोध करने पर शुरू हुए युद्ध में “टीपू सुल्तान” वीरगति को प्राप्त हो गये।मिर्ज़ापुर 200 सालों तक व्यापार का बड़ा केन्द्र रहा, मिर्ज़ापुर से भारी मात्रा में कपास बाहर जाया करता था। ऐसे में शहर में जल मार्ग द्वारा दाख़िल होने का एक मात्र रास्ता बना “Barrier Ghat” जिसे इन्होंने ही बनवाया, जो अब बारिया घाट के नाम से जाना जाता है।जब इतनी भारी मात्रा में सामानों की आवाजाही शुरू हुई तो लाज़मी था यहाँ एक मार्केट का होना जो “Wellesley Ganj” के नाम से काफ़ी फ़ेमस हो गया। वासलीगंज मिर्ज़ापुर शहर का पहला मार्केट था।एक किस्सा ये भी मशहूर है जब मिर्ज़ापुर से व्यापार बढ़ने लगा तो इलाहाबाद से रेल मार्ग द्वारा जोड़ने के लिए पटरी बिछवाने का कार्य इन्होंने ही शुरू करवाने का आवेदन अंग्रेजी सरकार को दिया था। हालांकि इन्होंने 1805 में अपना कार्यालय पूरा करके लन्दन वापस निकल लिए थे।इसके बाद मिर्ज़ापुर में कई अंग्रेजी अफसरों ने कदम रखा और शहर का लगभग 70 प्रतिशत अधिक हिस्सा विकसित किया जिसमें से मिर्ज़ापुर स्टेशन, घंटाघर, जिला न्यायालय, मिशन कंपाउंड, नार घाट, कछवां बाज़ार, तहसील, शहर कोतवाली,चर्च,मिशनरी स्कूल, डाकखाना, वासलीगंज और भी कई सारी जगह जो आज भी उपस्थित हैं।

ललिता शास्त्री : एक महान स्त्री, गृहणी, स्वतंत्रता सेनानी – जानिए पूरी कहानी

ललिता शास्त्री : एक महान स्त्री, गृहणी, स्वतंत्रता सेनानी - जानिए पूरी कहानी।मिर्ज़ापुर जनपद की इस मिट्टी ने बहुत से वीरों और वीरांगनाओं को जन्म दिया है जिनमें से कुछ को हम भूल चुकें हैं। आज की युवा पीढ़ी मिर्ज़ापुर के जिन पहलुओं से अवगत नहीं है हम उन्हें इस इतिहास से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं इसी क्रम में आज हम आपको एक रोचक तथ्य से रूबरू कराने जा रहे हैं।कि कैसे मिर्ज़ापुर से जुड़ा आम आदमी देश का प्रधानमंत्री बनता है और साथ ही साथ मिर्ज़ापुर की बेटी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश के प्रधानमंत्री की धर्मपत्नी और स्वतंत्रता सेनानी बनती हैं।भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। मुगलसराय (वर्तमान में प० दीन दयाल उपाध्याय) में 02 अक्टूबर 1904 में “मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव” के घर जन्में “लाल बहादुर श्रीवास्तव” उर्फ़ “नन्हें” भविष्य में भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे किसको पता था।प्रधानमंत्री का मिर्ज़ापुर से सम्बंध।भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के पिता का निधन बचपन में ही हो जाने के कारण उनकी माता “राम दुलारी देवी” को अपने मायके मिर्ज़ापुर आना पड़ा। मिर्ज़ापुर में नाना के पास रह कर गऊ प्रेमी लाल बहादुर श्रीवास्तव ने प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ समय बाद उनके नाना “हजारीलाल” का भी देहांत हो गया। मिर्ज़ापुर में गणेश गंज मोहल्ले में मामा लल्लन बाबू के पास अपना बचपन व्यतीत करने के बाद उन्होंने उच्चतर शिक्षा के लिए जनपद के बाहर बनारस जाने का विचार किया।बनारस के “श्री हरिश्चंद्र इंटरमीडिएट कॉलेज” में दाखिला उनके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने कराया और उनकी माँ का भी काफ़ी सहयोग किया। उसके उपरांत स्नातक के लिए वह बी एच यू गए, वहाँ उन्हें कई बार जाति सूचक शब्दों का सामना करना पड़ा। इससे खिन्न हो कर उन्होंने अपना उपनाम बदलने की सोची। उन दिनों बी ए की डिग्री को शास्त्री कहते थे, उन्होंने ने इस डिग्री को ही अपना टाइटल बना लिया, जो आज भी उनके परिवार की पहचान है।मिर्ज़ापुर के मस्तक पर शास्त्री जी का नाम।शास्त्री सेतु : मिर्ज़ापुर को पूर्वांचल से जोड़ने वाला एक पुल जो असल में इस शहर की मूलभूत आवश्यकताओं में सर्वोपरि है। इसके बिना शहर में किसी भी प्रकार के विकास की कल्पना असंभव है। लगभग 28 स्तंभों पर खड़ा, एक किलोमीटर लम्बा ये पुल जनपद के ललाट का तिलक है।मिर्ज़ापुर पहले ननिहाल अब ससुराल।वैसे तो शास्त्री जी बड़े सुलझे व्यक्तित्व वाले इंसान थे लेकिन हैरानी तब हुई जब उन्होंने शादी का प्रस्ताव के लिए गए बाबू गणेश प्रसाद से उपहार की माँग कर डाली। लेकिन जब उपहार में माँगी गयी वस्तु का पता चला तो लोग हँस पड़े। दरअसल उन्होंने शादी के उपहार के रूप में एक चरखा और 1 सिक्के की माँग की थी।लालमणि से विवाह के समय उन्होंने एक और माँग कि यह लालमणि का नाम बदलना चाहते हैं जो कि 16 मई 1928 को शादी करने के बाद लालमणि का नाम बदलकर “ललिता देवी” रख दिया। इसके पीछे कारण बेहद दिलचस्प है उनकी आस्था मीरापुर, इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) में स्तिथ “ललिता देवी मन्दिर” में काफ़ी रही है, जो 51 शक्तिपीठों में से एक हैं। जिसका प्रभाव उनके निजी जीवन में क़रीब से देखने को मिलता है।ललिता शास्त्री के जीवन से जुड़े रोचक तथ्य।11 मई 1910 को मिर्ज़ापुर में जन्मी ललिता शास्त्री जी का चेतगंज क्षेत्र के बल्ली का अड्डा मोहल्ले में गैबी घाट पर स्तिथ जो घर “गणेश भवन” कभी उनके संस्कारों की पाठशाला हुआ करता था, आज एक विद्यालय के रूप में बच्चों का जीवन खुशहाल बना रहा है।ललिता देवी के भाई चन्द्रिका प्रसाद के पुत्र मदन मोहन श्रीवास्तव के बेटे विपुल चंद्रा (ललिता शास्त्री जी के नाती) ने मिर्ज़ापुर ऑफिशियल से बात चीत के दौरान बताया कि वह अब उनके पुराने घर को ललिता शास्त्री जी की इच्छा अनुसार एक विद्यालय के रूप में संचालित कर रहे हैं। इस विद्यालय में अत्यंत निम्न मासिक शुल्क दे कर अंग्रेजी मीडियम स्तरीय शिक्षा देने का प्रबंध किया गया है।लाल बहादुर शास्त्री जी को बतौर स्वतंत्रता सेनानी कई बार कारावास जाना पड़ा, एक बार उन्हें 9 वर्षो की सजा हुई। उस दौरान उनके भोजन का प्रबंध मिर्ज़ापुर से ललिता देवी ही करती थीं। मिर्ज़ापुर से इलाहाबाद, नैनी जेल में सभी लोगों के लिए भोजन जाया करता था।इन्हें लिखने का बहोत शौक़ था इस कारण से खाली समय में बैठ कर इन्होंने कई सारी कविताएँ, भजन और गीत लिखे जो आगे चल कर एक पुस्तक के रूप में “ललिता के आँसू” शीर्षक के साथ “क्रान्त” एम एल वर्मा द्वारा 1978 में प्रकाशित किया गया।इस किताब में ललिता जी अपने दृष्टिकोण से शास्त्री जी के जीवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें स्वयं बताती हैं साथ ही साथ एक भक्ति गीत भी इसमें शामिल है “भोला भोला रटते -रटते, हो गई मैं बावरिया” 1957, जिसे भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी ने गाया और संगीतकार चित्रगुप्त जी ने ध्वनि मुद्रित किया है।आप भी सुने ये गीत।ललिता शास्त्री का प्रेरणादायी जीवन जो हमारे विद्यालयों के पाठ्यक्रम से वंचित रहा, उसे आप सब के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया है यदि आप चाहतें हैं कि आज की युवा पीढ़ी इस सत्य और मिर्ज़ापुर के महत्त्व को जाने तो इसे ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें।

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