इतिहास

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मिर्ज़ापुर अपने आप में इतना भरा है कि वर्णन करना कम पड़ जाएगा । विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं के आँचल में अर्थात विंध्याचल में माँ विंध्यवासिनी का भव्य मंदिर है। इस पूरे स्थान को शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है। एक कथा के अनुसार  जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया था, उस यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नही किया गया था जिससे क्षुब्ध होकर राजा दक्ष की पुत्री अर्थात भगवान शिव की अर्धांगिनी माँ सती ने राजा दक्ष के यज्ञ में कूदकर आत्मदाह कर लिया था।इस घटना से भगवान शिव भगवान क्रोधित होकर राजा दक्ष को दंड दिए तथा माँ सती का मृत शरीर कंधे पर लेकर विचलित अवस्था मे तीनो लोकों में भ्रमण करने लगे तब भगवान विष्णु ने अपने  सुदर्शन चक्र  से माँ सती के मृत शरीर के कई टुकड़े करके भगवान शिव के विचलित अवस्था को दूर किया एवम उनका मोह भंग किया।पूरे भारतवर्ष में माँ सती के गहने व अंग गिरे ।जहाँ जहाँ जिस जिस स्थान पर अंग गिरे वह शक्तिपीठ बन गए ।

उसी क्रम में यह प्रचलित है कि माँ सती का (उदर) पेट भाग यहाँ विन्ध्याचल में गिरा जहाँ साक्षात लक्ष्मी रूप में माँ आदिशक्ति विराजमान होकर सभी भक्तों को धन धान्य से पूर्ण करके मनोवांछित फल प्रदान कर रही है, तथा सारे संसार का भरण  पोषण कर रही है। यहाँ के जैसा शक्तिपीठ पृथ्वी पर  और कही नही हैं। शक्ति का एक और स्वरूप  माँ काली के रूप में काली खोह स्थान पर मिलता है। जहाँ पर दिखता है कि माँ काली की मूर्ति किसी मनुष्य द्वारा नही बनाई गई है। माँ काली प्रकट होकर स्वयं पत्थर के रूप मे हो गयी। एक कथा के अनुसार रक्तबीज नाम का राक्षस था । जिसको वरदान प्राप्त था कि जितने बूँद रक्त के उसके धरती पर गिरेंगे ,उतने ही रक्तबीज पैदा हो जाएंगे। आदिशक्ति माँ दुर्गा  उसका संहार करने के लिए प्रकट हुई। लेकिन रक्तबीज को मारने पर जितना रक्त रक्तबीज का बहता था उतने रक्तबीज पैदा होते गए इस तरह लड़ते- लड़ते माँ ने अपने हुंकार से सती मैंया  शायर मैंया और भैरव जी को प्रकट करी तथा स्वयं काली के रूप में हो गयी । एक हाथ मे खड्ग दूसरे हाथ मे  खप्पर जिसमें आग जल  रही थी। रक्तबीज पर टूट पड़ी।भैरव जी दैत्यों पर महाकाल की तरह टूट पड़े और रक्तबीज का संहार हुआ । माँ काली का गुस्सा शांत हुआ तब पत्थर रूप में हो गयी और वहाँ विराजमान है। जिसे हम काली खोह नाम से जानते है । वहाँ के आस पास की मिट्टी का रंग आज भी गेरुआ है ऐसा कहा जाता है इस  भूभाग में दैत्यों के संहार के वजह से ऐसा हुआ । उनके लहू बहने से जमीन लाल हो गयी । फिर काली खोह से थोड़ा आगे बढ़ते है तब  एक  गेरुआ तालाब भी  मिलता है जहाँ बरसात के मौसम में पूरे तालाब का पानी लाल (गेरुआ) रंग में दिखता है। जो कि अत्यंत मनोहारी लगता है। 1 किलोमीटर आगे बढने पर माँ अष्टभुजा का मंदिर है। जो कि पहाड़ के अंदर गुफा में माँ अष्टभुजा विराजमान है औऱ गुफा के प्रवेश द्वार पर एक मंदिर नुमा ढांचा बना दिया गया है।

अधिकांश शहर ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्थापित किये गए थे, लेकिन प्रारंभिक विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सबसे प्रसिद्ध अधिकारी द “लार्ड मार्कक्वेस वैलेस्ले” द्वारा स्थापित किया गया था। कुछ सबूतों के मुताबिक ब्रिटिश निर्माण की शरुआत बरीर घाट से हुई थी । लॉर्ड वैलेस्ले ने बंगाल घाट (बारिया) को गंग द्वारा मिर्ज़ापुर में एक मुख्य प्रवेश द्वार के रुप मे पुनर्गठित किया है। मिर्ज़ापुर मे कुछ जगह लॉर्ड वेलेस्ले के नाम के अनुसार , वेलेस्लेगंज (मिर्ज़ापुर में पहला बाज़ार) , मुकेरी बाज़ार ,तुलसी चौक इत्यादि के नाम के रूप में घोषित किया गया। नगर निगम की इमारत भी ब्रिटिश कंसक्शन्स का एक अनमोल उदहारण है।

मिर्ज़ापुर का इतिहास जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी यहाँ जुड़ी हुई कथाएं है। माँ गंगा के अविरल प्रवाह के साथ अनगिनत कथाएं भी मिर्ज़ापुर अपनी धरोहर में समेटे हुए है। अर्ध चंद्राकार में माँ गंगा मिर्ज़ापुर शहर की शोभा है वही पर एक छोर पर जाकर ये उत्तर वाहिनी हो गयी है।अध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो जहाँ जहाँ गंगा  उत्तर वाहिनी हुई है वो स्थान अपने आप मे तीर्थ स्थान हो जाता है।प्रत्येक वर्ष माघ माह में यहाँ उत्तर वाहिनी गंगा में स्नान करने का अपना अलग ही महत्व है इस अवसर पर प्रत्येक वर्ष यहाँ स्नान करने वालो का मेला लगता है। जिसमे बच्चे ,बूढे, स्त्री, पुरूष सभी लोग स्नान का पुण्य एवं मेले का आनन्द उठाते हैं।

यह भारत मे स्थित है जहाँ पवित्र नदी गंगा विंध्य रेंज से मिलती है। यह हिन्दू पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण माना जाता है और वेदों में इसका उल्लेख है , मिर्ज़ापुर के पास एक धार्मिक स्थल विंध्याचल की विंध्याचल, शक्तिपीठ ,उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में तीर्थस्थान का केंद्र है ।यहाँ स्थित विंध्यावासनी देवी मंदिर एक प्रमुख आकर्षण है और देवी के अशीर्वादों का आह्वान करने के लिए चैत्र और अश्विन महीने के नवरात्र के दौरान हज़ारों भक्तों द्वारा भरे हुए है। शहर में अन्य पवित्र स्थान है, अष्टभुजा मंदिर, सीताकुंड , कालीखोह, बूढेनाथ मंदिर, नारद घाट, गेरुआ तालाब, मोतिया तालाब, लाल भैरव और काल भैरव मंदिर, एक दंत गणेश, सप्तसरोवर, साक्षी गोपाल मंदिर, गोरक्ष कुंड, मत्स्येन्द्रकुंड , तारकेश्वर नाथ मंदिर, कर्ण कली देवी मंदिर, शिव शिव समोह मंदिर, भैरव कुंड। मिर्ज़ापुर निकटतम रेलवेस्टेशन है। विंध्याचल में पास के शहरों मे नियमित बस सेवाएं ,विंध्याचल को पास के कस्बों तक जोडती हैं।