क्या आप लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के ये रोचक व प्रेरक किस्से जानते हैं?

अगर आप वाराणसी या मिर्ज़ापुर के रहने वाले हैं तो आपको ज़रूर इसे पढ़ना चाहिए
 
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भारत के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा प्रधानमंत्री आज तक नहीं हुआ

नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क: आज सम्पूर्ण विश्व हमारे देश के द्वितीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के 117वें जन्मदिन को मना रहा है। आइए इस अवसर पर हम भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से आपको बताते हैं-

• लाल बहादुर शास्त्री का जन्म बनारस में व उनका विवाह मिर्ज़ापुर में हुआ था और उन्होंने "जय जवान जय किसान" का नारा मिर्ज़ापुर से 45 किलोमीटर दूर इलाहाबाद के उरूंवा के मैदान में दिया था। उन्होंने दहेज के रूप में एक चरखा व सूत से बना हुआ कुछ मीटर कपड़ा स्वीकार किया था। 

• लाल बहादुर शास्त्री ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि धारण की थी। 

• लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री होने से पूर्व गृहमंत्री, रेल और बिना विभाग के मंत्री रह चुके थे। उन्होंने दो बड़े रेल हादसे से आहत होकर रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार करते हुए कहा था इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया गया की लाल बहादुर शास्त्री दुर्घटना के लिए जिम्मेदार थे बल्कि इसे संसदीय मर्यादाओं में नज़ीर के रूप में याद रखा जाएगा। 
 

एक बार की बात है जब लाल बहादुर शास्त्री ने अपनी मां से कहा था कि वह रेल विभाग में नौकरी करते हैं जबकि उस वक्त वह भारत के रेल मंत्री थे ताकि उनकी मां या परिवार के अन्य सदस्य उनके पद का निजी लाभ के लिए प्रयोग ना करें। 

• प्रधानमंत्री बनने के बाद पारिवारिक दबाव में आकर लाल बहादुर शास्त्री जी ने ₹12000 की एक कार खरीदी थी, जिसमें से ₹5000 उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से लोन लिया था जिसे चुकाने से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई थी। तदोपरान्त इंदिरा गांधी ने उक्त लोन को माफ करने के लिए प्रयास किया था पर मिर्ज़ापुर की बेटी उनकी पत्नी ललिता शास्त्री ने लोन माफ करना स्वीकार नहीं किया और धीरे-धीरे लोन चुकता किया था। आपने शायद ही ऐसा कभी सुना हो कि एक प्रधानमंत्री को कोई कार खरीदने के लिए लोन लेने की आवश्यकता पड़े, यह अपने आप में शास्त्री जी की इमानदारी की कहानी सुनाता है।


• 1965 युद्ध में पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व को भरोसा था जवाहरलाल नेहरू के मृत्यु के बाद भारत कमजोर हाथों में हैं जिसका उन्हें फायदा उठाना चाहिए ख़ुद जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था कि उन्हें भरोसा था यह भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नहीं करेगा। भारतीय सेना के अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करने की एक दिलचस्प कहानी है दरअसल जब पाकिस्तानी से मारना जम्मू कश्मीर में बढ़त ले रही थी और पूर्व में चीन गीदड़ भभकी दे रहा था तो सबको लगा कि लाल बहादुर शास्त्री जी यह दबाव सह नहीं पाएंगे और हार मान कर बीच का रास्ता निकालने की सोचेंगे, पर इसके उलट लाल बहादुर शास्त्री जी ने संसद के पटल पर चीन की गीदड़-भभकी का मजबूती से जवाब दिया और लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह के सीमा पर कार्रवाई करने की योजना को शास्त्री जी ने हामी दे दी। नतीजा यह हुआ कि भारतीय सेना लाहौर के करीब तक पहुंच गई वहीं पाकिस्तान अपनी गलतफहमी पर इतना आश्वस्त था कि आईएसआई और पाकिस्तान सरकार को भारतीय सेना के लाहौर तक पहुंचने की खबर भी नहीं थी। 

• युद्ध के बाद दिल्ली में जनसभा को संबोधित करते हुए लाल बहादुर शास्त्री जी ने अयूब खान और पाकिस्तान की चुटकी लेते हुए कहा था, "सदर अयूब ने ऐलान किया था कि वो दिल्ली तक चहलक़दमी करते हुए पहुंच जाएंगे" अब वो इतने बड़े आदमी हैं, लहीम शहीम हैं. तो मैंने सोचा कि उनको दिल्ली तक पैदल चलने की तकलीफ़ क्यों दी जाए, हम ही लाहौर की तरफ़ बढ़ कर उनका इस्तेक़बाल करें"।


• ताशकंद समझौते पर जाने से पहले एक पत्रकार ने उनसे सवाल किया था अयूब खान हष्ट पुष्ट कद काठी की है और आप कमजोर और छोटे कद के आपको कैसा लगेगा जिस पर लाल बहादुर शास्त्री जी ने जवाब दिया था  "वो सर झुका कर बात करेंगे हम सर उठा कर बात करेंगे।"


• शास्त्री जी ने अपने ही बेटे की पदोन्नति रद्द करवा दी थी जब उन्हें मालूम चला था कि उनके बेटे की पदोन्नति गलत तरीके से हुई है। 


• देश में मैं खाद्यान्न संकट और अमेरिका के गेहूं ना भेजने की धमकी आहत होकर शास्त्री जी ने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर होने का सपना देखा था जिसके लिए उन्होंने हरित क्रांति आमजन की सहभागिता का आह्वान किया था वो कहते थे कि हमें जमीन के छोटे से छोटे टुकड़े पर भी खेती करनी चाहिए। 

• सूखे व खाद्यान्न संकट से जूझ रहे देश को संभालने के लिए शास्त्री जी ने दिल्ली के रामलीला मैदान से देशवासियों से एक समय उपवास करने का आह्वान किया था इस अपील से पहले उन्होंने अपने घर वालों को एक समय उपवास रखने की सलाह दी उनके घर में इस सलाह के पालन के पश्चात ही उन्होंने देशवासियों से उपवास की अपील की थी। 

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• एक दफा शास्त्री जी अपनी पत्नी को लेकर साड़ी मिल गए थे जहां उनकी पत्नी को एक साड़ी पसंद आ गई थी जिसकी कीमत लगभग ₹800 थी, शास्त्री जी ने मिल मालिक से कहा था यह साड़ी बहुत महंगी है वह इसे खरीद ना पाएंगे। उस पर मिल मालिक ने शास्त्री जी को साड़ी भेंट करनी चाही, जिस पर उन्होंने कहा कि "यह ठीक है कि मैं प्रधानमंत्री हूं पर हूं तो गरीब ही न", साड़ी की कीमत इतनी है कि वह खरीद नहीं सकते हैं तो भला उपहार के रूप में भला कैसे स्वीकार कर सकते हैं।