चुनाव 2022: मिर्ज़ापुर में बना रहेगा बीजेपी का दबदबा या सपा मारेगी इस बार बाजी, देखने को मिलेगी बदलाव की लहर?

मिर्ज़ापुर में फिलहाल मँझवा, चुनार, मड़िहान, छानबे, भदोही की 3 सीट एवं सोनभद्र की 4 सीट पर भाजपा और अपना दल
का कब्जा है।

 
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क्या मारेगी सपा बाज़ी।

मिर्ज़ापुर, Digital Desk: विन्धयाचल शक्तिपीठ एवं देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता यहां की पहचान माना जाता है। हम बात कर रहे हैं मिर्ज़ापुर मंडल की जहां पर धर्म और सियासत का रंग एक साथ बहता है। जिससे यहां की राजनीति में अलग ही मजा देखने को मिलता है। कभी दिग्गज नेता बड़ी भारी मात्रा में जीत जाते हैं, तो कभी नए प्रत्याशी से बुरी तरह हार जाते हैं। फिलहाल 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में NDA की सरकार ने मंडल की 11 सीटों पर कब्जा किया था, जबकि महज एक सीट निषाद पार्टी ने जीती थी। लेकिन इस बार पूरे मंडल में फिलहाल बीजेपी के प्रति गुस्सा देखने को मिल रहा है। अब देखना यह होगा कि बीजेपी के सत्ता विरोधी लहर को कंट्रोल करती है और समाजवादी पार्टी को चुनाव में टक्कर देती है।

विंध्य में बीजेपी ने किया है सराहनीय कार्य:

हर घर नल से जल, मेडिकल कॉलेज जहां सत्ताधारी बीजेपी के पास गिनाने के लिए कई सारे मुद्दे हैं। इसमें विंध्याचल कॉरिडोर का भी नाम जोड़ लीजिए, सड़क का निर्माण बड़ी-बड़ी हाईवे लेन आदि है। लेकिन हद से ज्यादा पिछड़े और नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास आज भी कम स्तर पर हुआ है। जिससे विधानसभा चुनाव में अभी यह बात सामने आ रही है कि जो दल भी जातीय समीकरण को इस मंडल में साध लेगा, इस वर्ग के मतदाता उसे अपना वोट देंगे।

राजनीतिक इतिहास:

राजनीतिक समीकरण से देखा जाए तो मिर्ज़ापुर जन संघ के समय से ही भारतीय जनता पार्टी का गढ़ मानी जाती है। विजय बहादुर, भगवानदास, आशाराम, राजनाथ सिंह और डॉ सुजीत डंग ने यहां से कई बार कमल खिलाया है, 2012 चुनाव में भले ही समाजवादी पार्टी यहां से जीती थी। लेकिन 2017 में फिर बीजेपी के रत्नाकर मिश्रा यहां से विधायक हुए।

चुनार की बात की जाए तो यहां से 93 में बीजेपी नेता ओमप्रकाश सिंह जीते थे और यहां से लगातार चार बार विधायक रहे थे। 2012 में सपा की लहर दौड़ी थी लेकिन फिलहाल 2017 में ओमप्रकाश के बेटे अनुराग यहां से विधायक है।

मड़िहान क्षेत्र में तो हमेशा से तिवारी परिवार का ही जलवा रहा है। इस सीट पर त्रिपाठी परिवार का कब्जा हो चुका है और कमलापति के पात्र ललितेश विधायक हुए। जबकि इससे पहले यह राजगढ़ विधानसभा में आती थी। कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी राजगढ़ से कई बार विधायक चुने जा चुके हैं, फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के रमाशंकर पटेल ने ललितेश को हराया था।

मौजूदा हाल:

चुनार किला, सिद्धनाथ की दरी, विंडम फाल यहां पर अगर थोड़ी सी सरकारी सहायता मिल जाए तो यहां का कल्याण हो जाए। लेकिन यहां आज तक किसी ने ध्यान नहीं दिया है। चीनी मिट्टी के बर्तन उद्योग भी अंतिम सांस ले रहे हैं। विश्वविद्यालय ना होने की वजह से मंडल के बच्चों को दूसरे जिलों में जाना पड़ता है, लेकिन फ़िलहाल सरकार ने विश्वविद्यालय को लेकर तो कल्याणकारी योजनाओं पर काम किया है। परिवहन को लेकर भी कुछ सड़कें बनी हैं, कुछ छोड़ कर अभी भी बन्नी बाकी है। यदि इस तरफ सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो रोजगार, महंगाई और इन सब मुद्दों को मिलाकर बीजेपी को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है।